शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

आगामी सिंहस्थ तक खंडवा-इंदौर बीच बिछी मीटरगेज रेल लाइन का ब्राडगेज में कन्वर्शन हो पायेगा या नहीं ?

इंदौर-खंडवा के बीच छोटी लाइन को बड़ी लाइन में बदलने का काम सिंहस्थ-2016 से पहले पूरा किये जाने के दावे किये जा रहे की , इंदौर-खंडवा के बीच छोटी लाइन को बड़ी लाइन में बदलने का काम सिंहस्थ-2016 से पहले पूरा कर दिया जाएगा। 2014 खत्म होने को है और काम के लिए सिर्फ एक वर्ष ही बचा है। ऐसे में मात्र एक-डेढ़ साल में खंडवा तक बड़ी लाइन बिछाने की बात किसी को गले नहीं उतर रही है । दरअसल, इस प्रोजेक्ट को लेकर पश्चिम रेलवे अभी शुरुआती तैयारियां भी मुकम्मल रूप से नहीं कर पाया है।

आगामी सिंहस्थ तक खंडवा-इंदौर बीच बिछी मीटरगेज रेल लाइन का ब्राडगेज में कन्वर्शन हो पायेगा या नहीं ? इसी सवाल के जवाब खोजती हमारी स्पेशल रिपोर्ट -
खंडवा -इंदौर मीटरगेज रेल लाइन पर विशेष अवसरों पर ओम्कारेश्वर तीर्थ स्थल तक पहुँचने के लिए यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करते है। मीटरगेज से इंदौर-खंडवा के बीच मात्र 130 किलोमीटर की दुरी तय करने में लगभग पांच से छह घंटे का समय लगता है। आगामी सिंहस्थ को देखते हुए यह दावा किया जा रहा है की इंदौर-खंडवा के बीच छोटी लाइन को बड़ी लाइन में बदलने का काम सिंहस्थ-2016 से पहले पूरा कर दिया जाएगा। सिंहस्थ से पहले इंदौर-खंडवा गेज कन्वर्जन की मांग लगातार उठती रही है ,इस मामले में खंडवा जनमंच के मनोज सोनी सहित अन्य कार्यकर्ताओं ने रेल मंत्रालय के सामने इस मांग को अनेको बार रखा। जनमंच को रेल मंत्रालय सुचना के आधार पर मिली जानकारी के अनुसार फैक्ट इस प्रकार है।
फैक्ट -
1 -अजमेर से हैदराबाद को जोड़ने वाली 1470 किलोमीटर लम्बी मीटरगेज रेलवे लाइन का ब्राडगेज कन्वर्शन कार्य वर्ष 1993 में शुरू किया गया .
2 - अजमेर से रतलाम तक मीटरगेजका ब्राडगेज कन्वर्शन कार्य वर्ष 2004 में पूर्ण।
3- रतलाम से फतेहाबाद 80 किलोमीटर . फतेहाबाद से इंदौर 40 किलोमीटर तक मीटरगेज का ब्राडगेज कन्वर्शन भी हाल ही में पूर्ण हो चुका है।
4 - अकोला से हैदराबाद तक गेज कन्वर्शन का कार्य बर्ष 2007 में पूर्ण।
5 -अब सिर्फ इंदौर से खंडवा और खंडवा से अकोला तक कुल ब्राडगेज कन्वर्शन का कार्य 350 किलोमीटर बाकी। जिसमे से इंदौर से महू तक मीटरगेज का ब्राडगेज कन्वर्शन मार्च 2015 तक किया जाना प्रस्तावित।
17 जनवरी 2008 को केंद्रीय आर्थिक मामलो की कमेटी ने निर्णय लिया था की 1421 करोड़ रुपयों की लागत से वर्ष 2013 तक शेष 472 किलोमीटर रतलाम से अकोला तक का गेज कन्वर्शन किया जाएगा , जिसमे से मात्र 120 किलोमीटर रतलाम से इंदौर तक गेज कन्वर्शन कार्य पूर्ण हो सका। गेज कन्वर्शन को लेकर हालत यह है कि महू से खंडवा के बीच प्रोजेक्ट के लिए सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण हिस्से में बिछने वाली बड़ी लाइन का न तो अभी सर्वे पूरा हो पाया है, न लाइन का अलाइनमेंट तय है। सर्वे और अलाइनमेंट तय होने में भी कम से कम दो महीने का समय लगेगा, क्योंकि निर्माण शाखा का पूरा जोर फिलहाल फतेहाबाद-इंदौर बड़ी लाइन का काम पूरा कर इंदौर-महू के बीच बड़ी लाइन बिछाने पर है। इंदौर-महू के बीच 23 किलोमीटर लंबी लाइन बिछाने और महू यार्ड रिमॉडलिंग में ही आठ महीने लगने का अनुमान है। आधिकारिक सूत्र भी 2016 तक इंदौर-खंडवा के बीच बड़ी लाइन बिछाने की बात से इत्तफाक नहीं रखते। चोरल-मुख्तयारा बलवाड़ा के लिए बीच बनने वाली टनल से बचने के लिए भी अफसरों को सबसे मुफीद और फिजिबल रास्ता खोजना होगा , रेल अधिकारी के मुताबिक़ महू से खंडवा के बीच चार टनल है। रेलवे की वर्तमान पॉलिसी अनुसार अब रेल मार्ग के लिए टनल को अवॉइड किया जाता है। टनल से बचने के लिए, रेलवे ने तीन वैकल्पिक मार्ग चुने है , जिनमे से एक ऐसे मार्ग को फाइनल करना है जो मोस्ट टेक्निकल , मोस्ट एकनॉमिकल हो । ।फाइनल लोकेशन के सर्वे पश्चात भूमि अधिग्रहण की समस्या आएगी। रेलवे को प्राइवेट[ जनता ] भूमि , प्रदेश सरकार से भूमि और केंद्र सरकार के वन मंत्रालय से भूमि अधिग्रहित करना होगी। जिसमे समय लग सकता है। उसके बाद चोरल-मुख्तयारा बलवाड़ा के बीच नई लाइन के लिए वन और पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति मिलने में समय लग सकता है। यह सब आगामी सिंहस्थ तक संभव नहीं है। रेल सूत्रों के अनुसार वर्ष 2014 समाप्ति की ओर है। 2016 में सिहंस्थ होगा। कार्य के लिए सिर्फ एक वर्ष 2015 मिलेगा , मान लिया जाए , की इस गेज कन्वर्शन ले लिए पर्याप्त बजट मिल जाए , तब भी इस सिमित अवधि के काम नहीं हो सकता , क्योंकि भूमि अधिग्रहण होगी , जंगल कटेगा , इस्टीमेट बनेगे , फिर कांट्रेक्ट के लिए टेंडर निकलेंगे , जिनके फाइनल होने में समय लगेगा , जिससे यह बात तो साफ़ होती है की सिंहस्थ तक गेज कन्वर्शन नहीं हो सकता।
सिंहस्थ से पहले महू से सनावद तक के कठिन गेज कन्वर्शन को बाकी छोड़कर , इंदौर से महू तक कुल 23 किमी और खंडवा से सनावद तक कुल 60 किलोमीटर की छोटी लाइन को बड़ी लाइन में बदला जा सकता है। मगर वह भी तब जब रेल मंत्रालय प्रोजेक्ट के लिए भरपूर राशि दे। 80 किमी लंबे महू-सनावद सेक्शन में तो काम शुरू होने की फिलहाल कोई गुंजाइश ही नहीं है। अभी तो लक्ष्मीबाईनगर-इंदौर-महू के बीच बड़ी लाइन के लिए ही 65 करोड़ रुपए की स्वीकृृति नहीं मिल पा रही है और खंडवा-सनावद बड़ी लाइन का डीटेल इस्टिमेट (करीब 475 करोड़) को ही रेलवे बोर्ड से मंजूरी नहीं मिली है। कब बजट मंजूर होगा, कब काम चालू होकर पूरा होगा, यह खुद अफसरों को भी नहीं पता। सालाना बजट में प्रोजेक्ट के लिए करीब 90 करोड़ रुपए दिए गए थे, जिनमें से अधिकांश राशि खर्च हो चुकी है। पश्चिम रेलवे ने इंदौर-महू के बीच काम करने के लिए बोर्ड से 65 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन मांगा है।
 अनंत माहेश्वरी खंडवा

आजकल पत्रकार को सिर्फ पत्रकार होना जरूरी नही है

आजकल पत्रकार को सिर्फ पत्रकार होना जरूरी नही है . पहली शर्त की वह जुगाडू हो , फुटेज नही मिले तो किसी से जुगाड़ कर उसे अपनी चैनल पर एक्सक्लूसिव बताकर चला सके . दूसरी शर्त की अगर आपको किस्मत से ब्यूरो बनने का मौका मिल जाए तो फिर आपको स्ट्रिंगर की पकी पकाई खिचडी पर अपने नाम की मुहर लगाते आना चाहिए . जमाना विज्ञान का है तो हमारे जुगाडू भाइयो ने कई चेंनल के ऍफ़ टी पी नंबर और पासवर्ड का भी जुगाड़ कर रखा है , करना क्या ? बस इधर का माल उठाया [  कापी किया ] और अपनी चेनल को भेज दिया . लो हो गया ना काम वह भी घर बैठे . अब भाई लोगो को इसमें गलत कुछ नही लगता , उनके पास तर्क भी है , जब एक चेनल दूसरी चेनल पर से खबर उठाकर उसे एक्सक्लूसिव बताकर चला सकती है तो वह एसा क्यों नही कर सकते ? 
       यह तो हुई इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात अब हम आपको मिलवाते है ऐसे पत्रकारों से जो प्रिंट मिडिया से है . मेहनतकश पत्रकारों लिखी गई खबर को ज्यों का त्यों अपने समाचार पत्र को भेज देते है, ये परजीवी पत्रकार कहलाते है . कुछ तो निर्जीवी भी है जो करते कुछ नही सिर्फ प्रेस का ठप्पा लगाकर अपनी शान बघारते है  .          
      एक किस्म और है चापलूस पत्रकारों की .. ये कोम तब भी पायी जाती थी जब राजवंश हुआ करते थे .. फर्क सिर्फ इतना है की उस जमाने में इन्हें भांड कहा जाता था . जिनका काम राजघरानों की शान में कसीदे पड़ना होता था . राजे- रजवाडे तो रहे नही ,भांड जरुर रह गये , जो आज भी अपनी खानदानी परम्परा का बखूबी से निर्वाह कर रहे है ..
    अब बारी है मुफ्तखोरों की ..... पत्रकारों की जमात में शामिल ऐसे मुफ्तखोरों के दर्शन आपको इसी पत्रकार वार्ताओं में जरुर मिल जायेंगे जहाँ वार्ता पश्चात भोज हो . ये बिनाबुलाये मेहमान अपने तगडे सूत्रों के बूते ऐसी पत्रकारवार्ताओं में जरुर पहुँच जाते है , वार्ता में अनाप-शनाप सवाल पूछकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना इनकी आदत होती है . ये आखरी दम तक गिफ्ट मिलने की आस नही छोड़ते .
   सार्वजनिक कार्यक्रमों में कैमरे के दम पर पत्रकारिता का ढोल पीटने वाले पत्रकारों की नई किस्म भी बाजार में आ गई है . जो कार्यक्रम की रिकार्डिंग तो पूरी करते है फिर उसे घर ले जाकर रख देते है .. क्या करे किसे दिखाए ? इनमे फोटो कैमरे लेकर घुमने वालों की संख्या  तो दिन रात बड़ रही है  ..
आप पत्रकारिता के पेशे में है ..तो ऐसी पत्रकारिता करने वालो के बारे में आपकी क्या राय है ? 
अनंत माहेश्वरी खंडवा [ म.प्र.] 09425085998

कभी कर्मवीर, कभी भारतीय आत्मा कहा गया .


कभी कर्मवीर, कभी भारतीय आत्मा कहा गया .
पुष्प की अभिलाषा की लिखने वाले की अभिलाषा को किसी ने नही समझा .
कर्मवीर भवन से प्रकाशित कर्मवीर समाचार पत्र  आजादी के वीरो के लिए प्रेरणा हुआ करता था . मेरे जाने के बाद वह भवन उजाड़ हो गया. गाहे-बगाहे कोई साहित्यकार तो कभी कोई पत्रकार कर्मवीर भवन में बसी भारतीय की आत्मा को खोजते और चले जाते .  कुछ ने मेरी पीडा को समझते हुए सोई हुई सरकार के कान में फूंक भी लगाई . लेकिन वह नही जागी , जागती भी कैसे ? जगाया उसे जाए जो सोया हुआ हो . भला सोने का बहाना करने वाले भी कभी जागते है ?
.......  यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा .कर्मवीर की खामोशी और गहराती गई . हर मौसम में मुझे पनाह देने वाले छत के कवेलू भी बिखरने लगे . कमजोर होती दीवारों की ईटे भी खिसकने लगी . .  कर्मवीर में रातो के वीर भी घुसे जो छोटी - मोटी चोरी करके चले गये . इस घटना ने उन्हें जगा दिया जो कर्मवीर को मात्र सम्पत्ति मानते रहे . और उन्होंने कर्मवीर बेच दिया .........
.........उस दिन इस भारतीय की आत्मा मानो शरीर से विदा हो गई . आत्मा के विदा होने के बाद कर्मवीर भी जमींदोज हो गया . अब वहां विशाल भवन है जिसमे प्राइवेट कम्पनियों के दफ्तर का फर्नीचर बन रहा है .
........आत्मा अमर है .कर्मवीर ना रहा तो क्या हुआ दादा की प्रतिमा तो है जो पद्म विभूषण पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की याद दिलाती है .
चाह नही .........पंक्तियाँ लिखी ,वो उस वक्त की जरूरत थी ..अब चाह नही के मायने बदल गये . मेरी प्रतिमा मयखाने के करीब लगा दी गई .  मदिरा पीकर मदहोश होने वाले ,मेरी प्रतिमा के आसपास ,होश आने तक पडे रहते है . शायद प्रशासन यही समझता है की मैंने पुष्प की अभिलाषा नही बल्कि मधुशाला लिखी हो ... पुष्प की अभिलाषा की लिखने वाले की अभिलाषा को किसी ने नही समझा .. अनंत माहेश्वरी खंडवा [म.प्र.]

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्राचीन आदिम जाति का दर्ज़ा देकर , संरक्षित की जा सकती है "कोरकू जनजाति "

प्राचीन आदिम जाति का दर्ज़ा देकर , संरक्षित की जा सकती है "कोरकू जनजाति " 

कोरकू जनजाति मध्य भारत के महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के सुदूर ग्रामीण अंचलो में निवास करती है .  मध्यप्रदेश के होशंगाबाद ,बैतूल ,छिंदवाडा और खंडवा जिले के वनग्रामो में रहने वाली इस जनजाति के लोग घूम खेती और शिकार करके अपना जीवन यापन करते है .  कोरकू जनजाति मध्य भारत की एक पिछड़ी और पोषण संवेदनशील जनजाति है . सामाजिक और आर्थिक स्तर पर ये अन्य प्राचीन आदिम जनजाति जैसे बैगा और सहरिया के बराबर है . लेकिन आज भी इन्हें प्राचीन आदिम जनजाति का दर्जा नहीं प्राप्त हुआ .
वर्ष 1973 में देश की सात सौ जनजातियों में से 75 जनजतियों को प्राचीन आदिमजाति का दर्जा दिया गया . जिसमे मध्यप्रदेश में निवासरत  46 जनजातियों में से सिर्फ तीन जनजातियां सहारिया,बैगा और भारिया ही यह दर्जा प्राप्त कर सकी ,कोरकू जनजाति इससे वंचित रह गई . जिससे उनका विकास अवरुद्ध हुआ . 

मध्यप्रदेश में मुख्य रूप से भील, गोंड, कोरकू जनजातियाँ निवास करती हैं। इन जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली बोलियाँ काफी समृद्ध एवं प्राचीन हैं। आधुनिकता के इस दौर में इन बोलियों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। इन बोलियों के अनेकों शब्द धीरे-धीरे इन जनजातियों की बोलचाल से विलुप्त होते जा रहे हैं।विश्व की जानी मानी संस्था यूनेस्को ने कोरकू भाषा पर चिंता जाहिर करते हुए लिखा की , सरक्षण के अभाव  में  कोरकू भाषा अगले दस वर्षो में विलुप्त हो जाएगी .  इस स्थिति में इन बोलियों के संरक्षण की दिशा में मध्यप्रदेश आदिम-जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान (टी.आर.आई) ने पहल करते हुए भीली, गोंडी एवं कोरकू बोलियों के शब्दकोश तैयार किये हैं। इन तीन बोलियों के लगभग 16 हजार शब्दों को संकलित कर पृथक-पृथक शब्दकोश तैयार किया गया है। प्रदेश में भीली और भिलाली बोलियाँ झाबुआ, अलीराजपुर, धार, खरगोन, बड़वानी, रतलाम आदि जिलों में, "गोंडी"  बोली डिण्डौरी, मण्डला, छिन्दवाड़ा, शहडोल, अनूपपुर, बैतूल, सिवनी, होशंगाबाद, सीधी, बालाघाट, रायसेन आदि जिलों में एवं "कोरकू"  बोली खण्डवा, बुरहानपुर, होशंगाबाद, हरदा और बैतूल आदि जिलों में रहने वाली जनजातियों द्वारा बोली जा रही हैं।
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खंडवा जिले के आदिवासी विकास खंड खालवा में एक लाख साहठ हजार आदिवासी रहते है . जिनमे कोरकू , गोंड और बारेला [भील ] शामिल है  . जिनमे  70% कोरकू जनजाति से है . जो मध्यप्रदेश के अलग -अलग हिस्सों में निवास करने वाली कोरकू जनजाति का कुल 31% है . कोरकू सीमांत किसान के रूप में है , जिनमे अधिकतर खेतिहर मजदुर है , अशिक्षा ,कुपोषण और रोजगार इस जनजाति के पिछड़ेपन की मुख्य वजह है  .आदिवासी विकासखण्ड खालवा के ग्रामीण अंचलो में विकास के नाम पर अरबों रूपये खर्च किये जा चुके है , बावजूद इसके यहां कुछ नहीं बदला ।  विकास के नाम पर कुछ ग्रामीण इलाको में पञ्च परमेश्वर योजना के तहत कंक्रीट की सड़के नजर आती है।  बिजली के पोल नजर आते है , जिसमे चार -पांच दिन के अंतराल से कुछ घंटो बिजली मिलती है।  कहने को इन आदिवासी इलाको में सभी तरह की सुविधा उपलब्ध है , सुविधा के नाम पर गाँव में स्कुल है , आंगनवाड़ी है , आशा कार्यकर्ता है , स्वास्थ केन्र्द भी है।  लेकिन सब बदहाल। यही वजह है की यहां रहने वाले  ग्रामीणो का सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं है। 

मध्‍यप्रदेश में निवासरत कोरकू आदिवासी , आज भी  उपचार के लिए पारम्परिक तरीको का सहारा लेते है . किसी भी तरह की बीमारी का उपचार चाचवा के जरिये किया जाता है . कोरकू बहुल आदिवासी विकास खंड खालवा में कुपोषित और बीमार बच्चों का उपचार , आज भी  पारम्परिक तरीके चाचवा से किया जा रहा है  ,चाचुआ यानी सुर्ख लाल, गर्म सलाखों बीमार मासूमों को दागने का प्रचलन बदस्तूर जारी है. सुदूर अंचलों में जहाँ चिकित्सा के साधनों के चलते लोग अपने मासूमों की जान दाव पर लगाकर उन्हें ओझा या बाबा से गर्म सलाखों से शरीर को दागवाते है. ग्रामीणों का ऐसा मानना है ऐसा करने से उनका बच्चा बिमारी से मुक्त हो जाएगा जबकि बच्चे इससे इन्फेक्शन का शिकार हो जाते है और उनकी जान पर बन पड़ती है. चाचवा इलाज पद्धति में गर्म लोहे की सलाखों से मानव अंगो को दागा जाता है . यह उपाय कारगर नहीं होने पर बीमार की मौत भी हो जाती है . 
कोरकू बहुल आदिवासी विकास खंड खालवा में कुपोषण भी गंभीर समस्या  के रूप  है।   पिछले वर्षों में कुपोषण से कई आदिवासी बच्चो की मौत हो चुकी है। महिला और बाल विकास विभाग जिले में कुपोषण के दंश को रोक नहीं पा रहा है। खंडवा जिले में बाल मृत्यु दर  अत्यधिक होने के कारण जिला प्रशाशन ने भी घुटने टेक दिए है। प्रति वर्ष बारिश के मौसम में , जिले के अलग पोषण पुनर्वास केन्द्रों पर भर्ती होने वाले कुपोषित बच्चो का औसत आंकड़ा दस बच्चे प्रतिदिन है . जिसमे दो से तीन अति कुपोषित बच्चे उपचार हेतु खंडवा रेफर किये जाते  है . जिले के खालवा विकासखंड में कुपोषण और मौसमी बीमारियों से हर माह 1 0 से 1 5 बच्चो की मौत हो जाती है। यह हालात मध्य प्रदेश के पूर्व आदिमजाति कल्याण मंत्री विजय शाह के विधानसभा क्षेत्र की है .

खंडवा जिले के खालवा ब्लाक के ग्रामीण अंचलो में 300 से अधिक  आँगनवाडियां चल रही है . जिसमे दर्ज संख्या के अनुपात में मात्र एक या दो प्रतिशत ही उपस्थिति होती है . कुपोषण की मुख्य वजह महिला बाल विकास विभाग की लापरवाही है . जो आँगनवाड़ी में दर्ज बच्चो की उपस्थिति को लेकर गंभीर नहीं है . शासन ने  कुपोषित बच्चो के परिवार वालो को बीपीएल एवं अन्तोदय योजना के तहत  राशनकार्ड बनाकर दिए.. बावजूद इसके कुपोषण थमने का नाम नहीं ले रहा है . जिला महिला और बाल विकास अधिकारी राजेश गुप्ता के मुताबिक जिले के अन्य गांवों में पिछले कुछ वर्षो में लगातार सुधार की स्थिति बन रही है. लेकिन खालवा और पंधाना में अब भी कम वजन और अति कुपोषित बच्चों की संख्या ज्यादा है | कम वजन के बच्चों का आंकड़ा 40 हजार के आसपास था |

एक नजर - खालवा पोषण पुनर्वास केंद्र में उपचार हेतु भर्ती कुपोषित बच्चो के वर्ष वार आंकड़ो पर -
वर्ष  2008-09 - बालक 81    बालिका -34   भर्ती 47     खंडवा रेफर - 06 
वर्ष  2009-10  - बालक 189 बालिका -o7    भर्ती 112   खंडवा रेफर- 08
वर्ष  2010-11   - बालक 289 बालिका -97    भर्ती -139खंडवा रेफर - 11
वर्ष  2011-12   - बालक 443 बालिका -220 भर्ती -217 खंडवा रेफर - 07
वर्ष  2012-13   - बालक 800 बालिका -346 भर्ती -454खंडवा रेफर- 94 

इन आंकड़ो से साफ़ होता  है की कुपोषण के प्रति अधिकारी और शासन गंभीर नहीं है . जो कोरकू जनजाति के लिए घातक है . आसान नहीं है जब तक इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जावेगा  तब तक यह दिक्कते आती रहेंगी . कोरकू आदिवासी के एक हालिया सर्वेक्षण से पात कहलता है की इनके बच्चों के बीच उम्र के अनुसार ऊंचाई जिसे तकनिकी भाषा में स्टनटिंग कहते हैं बढ़ रही है. यह सतत भूख और पोषण की कमी का परिणाम है. ... इनकी बढ़ने और सीखने  की क्षमता तो यहीं लगभग कम हो गयी. अपने शिकार संग्राहक अवस्था में कोरकू समाज जंगल से मिलने वाले कांड मूल खाते थे जो उनके पोषण का एक महत्वपूर्ण श्रोत था... धीरे धीरे दुसरे की देखा देखी खान पान बदला तो परम्परागत चीजें भी खानी बंद हो गयी पर पूरी तरह नहीं..  कोरकू बच्चे आज भी दूर दराज़ जंगल से कांड मूल खोद लाते हैं... परंपरागत पोषक अनाज जैसे कोड -कुटकी को वापस लेने का प्रयास किया जाए तो कुपोषण में कमी आएगी।  

भारत की जनगणना 1931 में लिखा है - कोरकू सबसे पिछड़ी जनजाति है .इसमें मात्र 3 साक्षर पुरुष है .और कोई भी साक्षर महिला नहीं है ,1961की जनगणना में भी समूचे कोरकू समाज [ महाराष्ट्र और निमाड़ सम्मिलित ] में मात्र 61 साक्षर पुरुष और 5 साक्षर महिलाये थी . 11 कोरकुओं ने मेट्रिक तक की पढ़ाई की थी . जिसमे 2 कोरकू मध्यप्रदेश के थे . ये सारे साक्षर पुरुष ही थे . 2001 की जनगणना के अनुसार कोरकू की साक्षरता की दर पुरुष 38.8 प्रतिशत है और महिला साक्षरता की दर 24.5 है .जो राज्य की ओसत जनजाति साक्षरता दर पुरुष 41.2 प्रतिशत और महिला साक्षरता दर 28.4 से भी कम है . 
आज भी कोरकू जनजाति के बच्चो की साक्षरता दर दुसरे ग्रामीण बच्चो की तुलनात्मक कम है .  कोरकू परिवार में रहने वाले छह या आठ बच्चो में से एक या दो बच्चे ही स्कुल जाते है . घर पर रहने वाले बच्चे अपने छोटे भाई -बहनों की देखरेख के लिए घर में रहते है . 

ग्राम लंगोटी में कोरकू परिवार के कुल दो सौ बच्चे स्कुल जाने लायक है ,लेकिन सिर्फ  बीस बच्चे ही स्कुल जाते है . यहां रहने वाले  शिवलाल भाऊ की बेटी साजन कोरकू समाज की एक मात्र ऐसी लडकी है जो नवमी कक्षा की पढ़ाई कर  रही है .ग्राम लंगोटी के शिवलाल भाऊ के परिवार में  कुल आठ थे . जिसमे दो बच्चो की मौत मौसमी बिमारी के चलते हो गई . बाकि बचे छ बच्चो में से सिर्फ दो बच्चे ही स्कुल जाते है . शिवलाल भाऊ ने गरीबी के चलते बाकी बच्चों को स्कुल में दाखिला नहीं दिलाया .खंडवा जिले के आदिवासी विकास खंड खालवा में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन स्पन्दन के कार्यकर्ता अनंत सोलंकी बताते है की कोरकू बहुल ग्रामो में सिर्फ पाचवी कक्षा तक की ही स्कूले है .आगे की पढाई करने के लिए कई किलोमीटर दूर की स्कुलो में जाना पड़ता है .  दूसरा प्रमुख कारण मजदूरी की तलाश में कोरकूओ का पलायन है . जो अपने परिवार के बड़े बच्चो को छोटे बच्चो की देखरेख में लगा देते है . ऐसे हालातो में इन्हें शिक्षा देने के सरकारी प्रयास भी नाकाम साबित हो रहे  है . कोरकू बहुल दूरस्थ गाँवो की सरकारी स्कुलो में पदस्थ शिक्षको की अपने कार्य के प्रति अरुचि भी कोरकू जनजाति के  पिछड़ने की एक वजह है। 

आदिवासी बहुल खालवा विकासखण्ड में रहने वाले  कोरकू परिवारों के लिए रोजगार पाना , किसी समस्या की तरह है ।  रोजगार  की तलाश में गाँव से पलायन करना पड़ता है . यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से जारी है।  आदिवासियों के पास जाब कार्ड है , पर रोजगार नहीं . गाँव में मनरेगा के तहत काम तो खुलते है , किन्तु सिर्फ कुछ लोगो को रोजगार मिलता है . वह भी एक वर्ष  में दस से पन्द्रह दिन . एसे में परिवार का पालन - पोषण कैसे करे ? यह समस्या है कोरकू बहुल आदिवासी विकास खंड खालवा में रहने वाले कोरकू परिवारों की . जिन्हें मज़बूरी में रोजगार  की तलाश में पलायन करना पड़ता है .  खालवा ब्लाक के गारबेड़ी , मौजवाडी ,ढ्कोची , पटाल्दा , उदियापुर माल और लंगोटी जैसे कई गाँवो की यही कहानी है।  यहाँ गाँव के  मजदूर परिवारों के मकानो में लगे ताले अपनी कहानी खुद बयान कर रहे है।  गाँव में रह रहे बूढ़े , बच्चे और महिलाओं ने बताया की   गाँव में मनरेगा के तहत वर्ष में सिर्फ दस से पन्द्रह दिन का रोजगार मिलता है  . बाकी दिनों में मजदूरी की तलाश में उन्हें  दुसरे राज्य में जाना पड़ता है .इसके अलावा कई ग्रामीणो की यह भी शिकायत है की  उन्हें  -आज -तक किसी भी सरकारी योजना का लाभ  नहीं मिला , ग्रामीणो का आरोप है की और  ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव अपने ख़ास लोगो को ही काम देते है . 
गाँव जमनापुर के बुजुर्ग बताते है की वे पिछले दस वर्षों से देखते चले आ रहे है की गाँव के युवा किराया लगा -लगाकर गाँव के बाहर काम की तलाश में चले जाते है।  गाँव का गाँव खाली पड़ा है , गाँव में सिर्फ बूढ़े और बच्चे ही बचे है। पलायन की मुख्य वजह रोजगार की तलाश है . गाँव में मनरेगा के तहत काम सीमेंट रोड निर्माण या कपिलधारा योजना के तहत कूप निर्माण के काम में गाँव के सिमित मजदूरों को काम मिलता है . वह भी सिमित दिनों के लिए . अगर माइक्रो प्लान अपनाया जाकर ग्रामीणों की जरूरतों के हिसाब से गाँव में सरकारी योजनाओं के कार्य खोले जाए , तो पलायन रोका जा सकता है . 

 ज्यादातर यह माना जाता रहा है कि कोकरू जनजाति का स्वाधीनता संग्राम में कोई अहम् योगदान नहीं रहा. जब भी स्वाधीनता संग्राम में जनजाति के योगदान का विवरण आता है तो स्वत टांटिया मामा या बिरसा मुंडा जैसे नाम सामने आते हैं.
निमाड की धरती में आज जहाँ कोरकू समुदाय कुपोषण, भूख और उपेक्षा की मार झेल रहा है वहीँ उनका भी एक वीर था जिसने अंग्रेजों और शोषकों के विरुद्ध असाधारण लड़ाई लड़ी थी.
रंगु कोरकू जो सोन खेडी गावं का निवासी था अधिकतर समय टांटिया भील के दल में एक प्रमुख सदस्य के रूप में ( १८७८ से १८८९) तक शामिल रहा. १८८० में टांटिया के २०० साथी गिरफ्तार हुए और उनमें से कुछ जबलपुर जेल से भाग कर निमाड में अपने संघर्ष को संबल प्रदान करते रहे. रंगु कोरकू भी शायद इसमें एक था. टांटिया का क्षेत्र इंदौर राज्य से एल्लिच्पुर और होशंगाबाद जिलों तक विस्तृत हो गया था. सेंट्रल इंडिया के ब्रिटिश एजेंट सर लेपल ग्रिफ्फिन को भी सफलता हासिल नहीं हुई. टांटिया के सर पर ५००० रुपयों का इनाम था.
इस दौरान होलकर शासन और ब्रिटिश सर्कार द्वारा जारी इश्तेहारों , इनाम की नोटिसों और राजपत्रों में टांटिया और उनके साथी की सूचि में रंगु कोरकू का नाम शामिल रहा.
८ मार्च १८८८ को अंग्रेजों द्वारा जारी फरमान जिसमे इंदौर दरबार ने भी २००० रूपये के इनाम की घोषणा की थी उसमे टांटिया के कुछ साथियों के साथ रंगु कोरकू के समक्ष भी टांटिया भील को पकडवाने की शर्त पर माफ़ी की पेशकश की गयी थी. पर ऐसा नहीं हुआ..
टांटिया मामा को तो सम्मान मिला पर निमाड का यह कोरकू वीर इतिहास के पन्नों पर भी खो गया.
कोरकू के जनप्रतिनिधियों या खुद उसके कोरकू समाज ने भी उसकी सुध नहीं ली.
यदि रंगु कोरकू की यादों को ताज़ा किया जाए तो गरीबी और भूख से जूझते कोरकू समाज का मनोबल बढेगा जो खुद यह मांग कर रहा है कि उसे प्राचीन आदिम जाती का दर्ज़ा मिले.  प्राचीन आदिम जाति का दर्ज़ा देकर , ही संरक्षित की जा सकती है "कोरकू जनजाति " 

अनंत माहेश्वरी 

कविता -पत्रकार है कहलाता

सिस्टम सुधारने की बात करता
दीवानगी की हदों को पार करता 
कलम से प्रहार करता 
पत्रकार है कहलाता 

असुरक्षित माहौल में  
खबर पाने की फ़िक्र में  
अपनी फ़िक्र  जो नहीं करता 
पत्रकार है कहलाता 

लक्ष्मी से वंचित वह रहता   
सरस्वती की पूजा करता 
बुद्धिजीवी वह कहलाता 
 
अभावग्रस्त जीवन वह जीता 
पत्रकार है कहलाता 

चौथा स्तम्भ की संज्ञा वह पाता 
सर्वनाम होकर रहजाता 
पत्रकार वह कहलाता 

अनंत माहेश्वरी खंडवा  
 

कविता- घनघोर घटाएं

घनघोर घटाएं 
जमकर बरसो 
बरस -बरस के इतना बरसो 
की फिर ना बरसों बरसो।  

अनंत माहेश्वरी 

कविता - बदरा इतना क्यों तरसाते हो

बदरा इतना क्यों तरसाते हो 
प्रेमिका की तरह आते हो 
और एक झलक दिखा कर चले जाते हो 

 तुम्हारे इन्तजार में आँखे तरसे
की बदरा अब बरसे की कब बरसे 

बदरा  इतना भी ना तरसाओ 
अब तो आँशु भी सूखने लगे है 
अमृत बून्द बनकर , बरस जाओ , बरस जाओ 
अनंत माहेश्वरी